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देवरिया : बस्ते के बोझ से बेहाल नौनिहाल, कहते हैं कि स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन का वास होता है, और स्वस्थ मन में ही शिक्षा का होता है संचार

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देवरिया : बस्ते के बोझ से बेहाल नौनिहाल, कहते हैं कि स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन का वास होता है, और स्वस्थ मन में ही शिक्षा का होता है संचार

देवरिया: कहते हैं कि स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन का वास होता है। स्वस्थ मन में ही शिक्षा का संचार होता है। व्यक्तित्व के विकास में जन्मदाताओं, अभिभावकों, शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका है। देश के भावी कर्णधारों का बचपन उन्मुक्त वातावरण में बीते,यह जिम्मेदारी सभी की है, लेकिन ये क्या बीसवीं सदी में शिक्षा देने के नाम पर बचपन को ही बोझ बना दिया गया। इसके लिए विद्यालय तो जिम्मेदार हैं ही,साथ ही वे अभिभावक भी कमतर नहीं हैं,जो अपने पाल्यों को कम समय मे ही सफल बनाना चाहतें हैं।

शिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 के अन्तर्गत दिए गए बाल अधिकारों की धज्जियां उड़ाई जा रही है। बच्चों को लेकर कोई संजीदा नहीं है। बेहतर शिक्षा के नाम पर बच्चों पर बोझ लादा जा रहा है खेलने-खाने की उम्र में कोमल भावनाओं को पढाई के नाम पर बीमार बनाया जा रहा है। प्ले वे के नाम पर तीन वर्ष का बच्चा एक बैग में किताब-कापी,पानी का बाटल,पेन्सिल बाक्स सहित अन्य सामानों को बैग में रखकर एक हाथ से टाई को सम्भालते विद्यालय पहुंच रहा है।

उपनगर स्थित एक विद्यालय में तो नर्सरी,एलकेजी की कापी किताब 1500 से लेकर दो हजार रुपये की है, जिसमें 6 कापी,अंग्रेजी,हिन्दी ,गणित,ड्राइंग,राइ¨डग,रेम्स,टेबुल बुक सहित आधा दर्जन किताबें,रफ की कापी, पेन्सिल बाक्स, वाटल आदि कुल मिलाकर लगभग पांच से छ: किग्रा का वजन बैग मे रखना पड़ रहा है, जिसकी उम्र पांच से सात वर्ष हो,यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वह अपने वजन से कितना अधिक भार ढ़ो रहा है। उपनगर के एक विद्यालय में पढ़ने वाला कक्षा एक का छात्र रोहित,ग्राम वंसहिया निवासी कक्षा तीन की छात्रा सुमन यादव,देवगांव निवासी कक्षा चार का छात्र निलेश ये सभी छात्र घर से पैदल बैग पीठ पर लादकर ज्यादा वजन लेकर प्रतिदिन विद्यालय जाते है।

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