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बलरामपुर : स्कूल के प्रति बढ़ा बच्चों का लगाव

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स्कूल के प्रति बढ़ा बच्चों का लगाव

बलरामपुर : शिवपुरा शिक्षा क्षेत्र में स्थित प्राथमिक विद्यालय रतोही कला स्थानीय बच्चों की शिक्षा का मुख्य केंद्र बन गया है। स्कूल दूर होने के चलते पढ़ाई से वंचित रहने वाले बच्चे अब इस विद्यालय में बुनियादी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। इससे क्षेत्र में शिक्षा के स्तर का विकास भी हो रहा है।

पहले रतोही गांव में रहने वाले के बच्चों को पढ़ने के लिए ललिया व उसके आसपास वाले स्कूलों में जाना पड़ता था। ऐसे में बड़ी संख्या में गांव की लड़कियां व कुछ बच्चे पढ़ाई से वंचित रह जाते थे। इंचार्ज प्रधानाध्यापक अरुण कुमार यादव के नेतृत्व में अप्रैल 2015 में रतोही कला गांव में प्राथमिक विद्यालय का संचालन शुरू हो गया। पहले सत्र में यहां 43 बच्चों ने अपना नामांकन कराया। नामांकन बढ़ाने के लिए अरुण कुमार ने अभिभावकों का जागरुक करना शुरू किया। इसमें वह घर-घर जाकर लोगों को पढ़ाई का महत्व बताते हुए परिषदीय स्कूल में सभी सुविधाएं मुफ्त मिलने की जानकारी देते थे। जागरुकता आने पर लोग अपने बच्चों स्कूल भेजने लगे। अपनी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व अच्छे माहौल के चलते दो सत्र में ही स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या 149 पहुंच गई है। इसमें से प्रतिदिन 100 से 110 दस बच्चे स्कूल आते हैं। यहां प्रधानाध्यापक के नेतृत्व में सहायक अध्यापक अंजली सिंह व अजय कुमार बच्चों को विषयपरक शिक्षा देने के साथ उन्हें अन्य जानकारी भी देते हैं। जिससे बच्चों का सर्वागीण विकास हो सके। शिक्षकों ने स्कूल को आकर्षक बनाने के साथ ही बच्चों के लिए अच्छे शौचालय आदि का निर्माण भी कराया है। प्रधानाध्यापक अरुण कुमार ने बताया कि यह लोगों का शैक्षिक स्तर कम है। हमारा उद्देश्य स्कूल आने वाले बच्चों को सभी क्षेत्रों में पारंगत करना है। जिससे बच्चे पढ़ लिखकर आगे बढ़ सकें।

-बालिकाओं की पढ़ाई में हुआ है सुधार

गांव में कोई स्कूल न होने के चलते आसपास के बच्चों को प्राथमिक स्तर तक की पढ़ाई करने के लिए ललिया जाना पड़ता था। ऐसे में क्षेत्र के लड़के तो दूसरे गांव चले जाते थे, लेकिन लड़कियों की पढ़ाई नहीं हो पाती थी, लेकिन गांव में स्कूल खुलने से इसमें सुधार हुआ है। अब गांव की लड़कियां भी नियमित पढ़ने जाने लगी हैं।

-व्यवहारिक शिक्षा पर जोर

प्राथमिक विद्यालय रतोही कला में शिक्षक बच्चों को विषयपरक शिक्षा देने के साथ उन्हें व्यवहारिक चीजें भी सिखाते हैं। इसमें बच्चों को सांस्कृतिक गतिविधियों में प्रतिभाग करना, कृषि कार्य, बागवानी, विभिन्न प्रकार के खेल, व्यायाम, संगीत, चित्रकला व पेंटिंग आदि की शिक्षा भी देते हैं। जिससे बच्चे इन क्षेत्रों में भी आगे बढ़ सकें।

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