बरेली : बच्चे यहां बुनते हैं सुनहरे सपने, घने अंधेरे के बीच उजाला फैलाने का एक अनूठा प्रयास, जिंदगी संवारने का दिया मकसद
अभिनय सिंह, बरेली । प्रदेश में बेसिक शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह बदहाल है। कहीं शिक्षक नहीं, तो कहीं बच्चों का टोटा। कहीं डेढ़ सौ बच्चों पर एक शिक्षक है तो कहीं जर्जर भवन। कभी किताबें नहीं बंटतीं तो कभी मिड डे मील। कुछ समय पहले जूनियर हाईस्कूल कोहाड़ापीर और भूड़ भी ऐसी तमाम समस्याओं से गुजर रहा था, मगर एक सपने ने ऐसी सारी समस्याओं को नजरअंदाज कर कक्षा छह से आठ तक के बच्चों को अपनी जिंदगी बनाने-संवारने का मकसद दे दिया। यह अलख जगाई है यहां के एबीआरसी डॉ. अनिल दुबे ने। सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा होल्डर अनिल शिक्षा विभाग में यह पहल कर दूसरों के लिए नजीर बन गए हैं।
करियर पहल..एक अनूठा प्रयास
इस कार्यक्रम को यही नाम दिया गया है। सत्र की शुरुआत में इस स्कूल के बच्चों के पास भविष्य के लिए कोई सपना ही नहीं था, मगर काउंसिलिंग के बाद बच्चों के नजरिये में तब्दीली आई और वे सपनों की दुनिया में उड़ान भरने लगे हैं। इस पहल के तहत दोनों स्कूलों में सबसे पहले बच्चों की एक ‘मेरा सपना है’ नामक डायरी बनवाई गई है। और बच्चों को कहा गया कि इसमें लिखो, आप क्या बनना चाहते हैं? किसी बच्चे ने लिखा पुलिस इंस्पेक्टर, किसी ने शिक्षक, किसी ने पुलिस अफसर, इंजीनियर, डॉक्टर और वकील।
ऐसे आगे बढ़ते हैं सपने
बच्चों के सपनों को जानकर उन्हें दिशा देने की शुरुआत की गई। उनके सपनों के अनुरूप विशेषज्ञ बुलाया जाता है। पहले सेशन में विशेषज्ञ अपने करियर का सफर बच्चों से शेयर करते हैं और दूसरे सेशन में बच्चे उनसे सवाल जवाब करते हैं। बच्चे जब भी कुछ पूछना चाहें, उन्हें फोन कर सकते हैं।
साथ ही विद्यालय की ओर से बच्चों को उनके सपनों के अनुरूप डाटा मैटेरियल भी उपलब्ध कराया गया है।
साधनहीन बच्चों के मन में इस पहल से कुछ करने की ललक पैदा करने की कोशिश की गई है। कुछ बच्चे भी अगर इन सपनों को जी लेंगे तो हमारी मेहनत सफल हो जाएगी।
-डॉ. अनिल दुबे, एबीआरसी
मेरे पिता मांझा की चरखी बनाते हैं। मैं रोज स्कूल आती हूं। सर ने मुझसे पूछा तो मैंने बताया कि मैं टीचर बनना चाहती हूं क्योंकि मुङो पढ़ना और पढ़ाना पसंद है। मैंने अपनी डायरी भी बनाई है। उसमें पहले पेज पर मैंने अपना सपना लिखा है। बड़ी होकर मैं टीचर जरूर बनूंगी।
नाजिया, छात्र कक्षा आठ
एक्सपर्ट की बात
मैं बच्चों से मिली थी और बच्चों ने बड़े गौर से मेरी बातें सुनीं। वैसे यह बड़ा अच्छा प्रयास हुआ है और बच्चों में उसका असर भी दिखा। आज के दौर में मोटिवेशन की बच्चों में बहुत जरूरत है।
-डॉ. सविता उपाध्याय, प्रवक्ता, कन्या महाविद्यालय भूड़